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Friday, November 4, 2011

रमेश के "नालायक" बेटे

रमेश अपने आँगन में बैठा सोच रहा था, हे भगवान क्या होगा मेरे बच्चों का ? पूरे गाँव में नाक कट चुकी है कि रमेश के छोरे बिगड़ गए हैं| यही नहीं अब तो कोई इन्हें अपने बच्चों के साथ दोस्ती भी नहीं करने देना चाहता| कहते हैं; एक गन्दी मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है, मेरे तो तीनों बेटे नालायक हैं | पहला बेटा राकेश, बारहवीं करके इतना खुश हुआ कि कालेज की शक्ल देखना भी नागवार है; कहता है कि इतना पढ़ गए बस काफी है| कोई कह रहा था कि किसी लड़की के चक्कर में पड़ कर पैसे कमाने की होड़ में लग गया होगा|

दूसरा लड़का अंतू दिमाग से तो तेज है, पढ़ भी रहा है, पर उसे भी अपने भाई को देख कर पैसे का भूत सवार होता जा रहा है; पढता भी है तो मजबूरी में| गाँव वाले बातें बनाते हैं कहते हैं तुम्हारे दोनों बड़े लड़के हमारे बच्चों को बिगाड़ रहे हैं; जिस गाँव में कभी बच्चे सिर्फ पढ़ाई-लिखाई और पहाड़ों की बातें किया करते थे, वहाँ अब सी ग्रेड फिल्मों और सेट्टिंग जैसी बातें होने लगी हैं | कुछ लोग तो अपने बच्चों को लेकर शहर चले गए हैं; इस उम्मीद में कि कम से कम वहाँ पढ़ाई का माहौल तो होगा|

तीसरा बेटा लल्लू तो शुरू से ही निरा मूर्ख और भोला है; दूसरी कक्षा में ही फेल हो गया था; जैसे-तैसे पांचवी में पहुंचा है|

यही सारी बातें रमेश के दिमाग में चल रही थीं; इसी मोहल्ले के कुछ लोग पढ़ लिख कर इंजिनियर, वकील बन गए; आज बड़े शहरों में मोटी कमाई करते हैं ; उनके बच्चे पिछली बार आए थे तो अंग्रेजी में बात कर रहे थे; यहाँ तो पूरे गाँव में कोई ऐसी फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं बोलता| जो जानते हैं वो भी गाँव में आपस में तो भला क्या अंग्रेजी बोलेंगे!

इतने में ही उसकी पत्नी ने जोर से आवाज़ लगाई, "अजी जरा, भैन्संनें खड्ड ते ले आओ, शाम है गई है |"

***
(तीन साल बाद)

अंतू को शहर में नौकरी मिल गई है; तीनों में से सबसे ज़िम्मेदार यही निकला है; हर रोज शहर और गाँव में अप-डाउन करता है ताकि परिवार के साथ रहकर उनका ध्यान रख सके| सन्डे का दिन है, पूरा परिवार आँगन में नीम के पेड़ के नीचे बैठा सुस्ता रहा है|

"पापा, मुझे २०, ००० रूपए की जरुरत है, सालभर में लौटा दूंगा ", राकेश ने कहा |

"का करैगो इत्तेक रुपैय्यन कौ ? "रमेश ने पूछा |

"मैं डी जे का काम करना चाहता हूँ, शादी-ब्याह में आजकल बड़े रुपैय्या मिलें डी जे वालंनें|"

"पढ़ लिख लेतौ तो रुपैय्या तो वैसे ई मिल जाते तोए, चल लै लइयो, हमारौ का है; सब तुम्हारे काज ही धर रखो है; कछु तो कर| घर में बैठो प्राण पीतो है हमाए | गाम में सबरे लोग बात बनावतैं, कछु करतौ ना है तुम्हारौ बडौ छोरा|"

***


डी जे का सारा सामान आ गया; सालभर तक राकेश ने लल्लू की मदद से खूब मेहनत की| दूर-दूर के गाँव में जाते थे दोनों; शादियों में गाने चलाते थे, और रात को गाने बंद करने पर बारातियों की गालियाँ भी खाते थे| एक शादी में तो कुछ नशेडी बारातियों ने दोनों को पीट भी दिया |

सावों के दिनों में अच्छी कमाई हुई; पर देव सो गए तो धंधा बंद! 'यह तो हर साल ऐसे ही चलेगा' दोनों ने सोचा, अभी तक की कमाई से दोनों ने मिलकर अपने गाँव में ही घर के आँगन में एक परचूनी की दुकान डाल दी| शहरी भाषा में बोलें तो ऑफ-सीज़न में, नए बिजनस पर अभी तक की बची हुई कमाई को 'इन्वेस्ट' कर दिया| पिताजी के २०,००० रूपए भी लौटा दिए| अंतू तो शहर में सेट हो ही गया था, अब ये दोनों भाई भी व्यस्त रहने लगे| ऑफ-सीज़न में केवल दुकान चलाते थे और ऑन-सीज़न में दिन में दुकान में बैठने के बाद रात को डी जे बजाते थे| घरवालों को थोड़ी राहत मिली कि चलो एक बेटा तो समझदार था ही, बाकी दोनों का भी काम में मन लग रहा है| रमेश की चिंता काफी हद तक कम हो गई|

***

(दो साल बाद)

राकेश और लल्लू ने कुछ साथियों के साथ मिल कर शहर में एक म्यूजिक कंपनी डाल ली है, आखिर कंपनी खोलने के लिए पैसा और लोग ही तो लगते हैं, हमारे देश में दोनों की कोई कमी नहीं है, बस साहसी लोगों की कमी है| चूंकि दोनों ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे; और बाकी लोगों पर इतना भरोसा नहीं किया जा सकता था; दोनों ने मिलकर अंतू को ऑफिस का सारा काम सँभालने के लिए मना लिया है|

राकेश और अंतू की शादी हो चुकी है और बच्चे भी हैं| रमेश खुश है; जो लोग पहले उससे कन्नी काटते थे, या ताने कसते थे, वो आज उसी के पास उसके "नालायक" बच्चों की कंपनी में नौकरी के लिए अपने बच्चों की सिफारिश करवाने आते हैं|

वो क्या है कि तीनों भाई ज्यादा लोगों को नौकरी नहीं देते, पर जिनको देते हैं उनका "पैकेज" अच्छा ही होता है| क्योंकि वो पैसे और स्थाई कर्मचारी की कंपनी के लिए जो अहमियत होती है, उसे अच्छी तरह समझते हैं|

जय हिंद, जय भारत |
(यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है )

2 comments:

ABHISHEK AGRAWAL said...

mast hai bhai..so inspiring...picture frame is very nice..

The Jaipurite said...

Thanks abhishek